NASA तक पहुंचने वाले डॉ आनंद मेगालिंगम की कहानी आज लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है। एक साधारण किसान परिवार से निकलकर एयरोस्पेस की दुनिया में बड़ा नाम बनाने वाले आनंद ने साबित कर दिया कि सपनों की उड़ान हालातों से बड़ी होती है। ट्रैक्टर ड्राइवर के बेटे आनंद का सफर आसान नहीं था। शुरुआती पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कंप्यूटर साइंस में एडमिशन लिया था  ताकि एक सुरक्षित नौकरी मिल सके। लेकिन उनका दिल मशीनों और अंतरिक्ष विज्ञान में बसता था। कोडिंग में मन न लगने के कारण आनंद ने कॉलेज छोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने अपने असली जुनून को चुना और एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया। यहां उनकी मेहनत और लगन ने नया इतिहास रच दिया। उन्होंने 9 8 CGPA के साथ गोल्ड मेडल हासिल किया जो संस्थान के सबसे बेहतरीन रिकॉर्ड्स में गिना गया। एरोस्पेस सेक्टर में आगे बढ़ने के दौरान आनंद ने अमेरिका जाने के लिए US Visa के लिए आवेदन किया  लेकिन उनका वीजा रिजेक्ट हो गया। यह किसी भी युवा के लिए बड़ा झटका हो सकता था  लेकिन आनंद ने हार नहीं मानी। उन्होंने कहा सरहदें इंसानों के लिए होती हैं इनोवेशन की कोई सीमा नहीं होती। यहीं से उन्होंने भारत में रहकर कुछ बड़ा करने का फैसला किया। अपने पिता के सहयोग से आनंद ने Space Zone India की शुरुआत की। उनकी कंपनी ने एयरोस्पेस सेक्टर में ऐसा काम किया  जिसने दुनिया का ध्यान खींचा। डॉ आनंद की अगुवाई में कंपनी ने RHUMI H मिशन लॉन्च किया  जिसे भारत का पहला मोबाइल प्लेटफॉर्म से लॉन्च होने वाला रीयूजेबल हाइब्रिड रॉकेट माना जाता है। इसके बाद RHUMI 1 की सफलता ने एशियाई एयरोस्पेस इंडस्ट्री में भारत की ताकत को नई पहचान दी। उनकी उपलब्धियों के बाद NASA ने भी उन्हें सराहा और वैश्विक स्तर पर पहचान मिली। डॉ आनंद मेगालिंगम की कहानी यह साबित करती है कि असफलता अंत नहीं होती। अगर जुनून और मेहनत सच्ची हो तो रिजेक्शन भी सफलता की नई शुरुआत बन सकता है।