धनबाद: करीब 39 साल पुराने कथित रिश्वतखोरी मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने बसंतीमाता कोलियरी के कर्मचारी भोलू मंडल को बड़ी राहत देते हुए बरी कर दिया है। हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अरुण कुमार राय की अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष रिश्वत मांगने का आरोप साबित करने में विफल रहा, इसलिए दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा जा सकता।

रिश्वत मांगना साबित होना जरूरी: हाईकोर्ट

अपने फैसले में अदालत ने स्पष्ट कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में केवल रिश्वत की रकम की बरामदगी या स्वीकार करना पर्याप्त नहीं है। दोषसिद्धि के लिए यह साबित होना आवश्यक है कि आरोपी ने वास्तव में रिश्वत की मांग की थी। चूंकि अभियोजन पक्ष इस महत्वपूर्ण तथ्य को साबित नहीं कर सका, इसलिए भोलू मंडल को बरी कर दिया गया।

1987 में CBI ने किया था ट्रैप

मामला दिसंबर 1987 का है। शिकायतकर्ता सुखलाल दास ने सीबीआई से शिकायत की थी कि उनकी पत्नी की मृत्यु के बाद भविष्य निधि (PF) और ग्रेच्युटी की राशि जारी करने के एवज में भोलू मंडल ने 200 रुपये और दूसरे कर्मचारी डब्ल्यूएच खान ने 300 रुपये रिश्वत की मांग की थी।

शिकायत के आधार पर सीबीआई ने 16 दिसंबर 1987 को ट्रैप बिछाकर दोनों कर्मचारियों को कथित रूप से रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया था।

2002 में हुई थी दो साल की सजा

इस मामले में वर्ष 2002 में विशेष अदालत ने भोलू मंडल को दोषी करार देते हुए दो वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ उन्होंने झारखंड हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

गवाहों के कमजोर पड़ने से पलटा मामला

अपील की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता सुखलाल दास की मुकदमे के दौरान मृत्यु हो चुकी थी, जिसके कारण उनका बयान अदालत में दर्ज नहीं हो सका। वहीं, सीबीआई का एक स्वतंत्र गवाह भी अपने पहले दिए गए बयान से मुकर गया।

इन परिस्थितियों में अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष रिश्वत मांगने के आरोप को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने भोलू मंडल को बरी कर दिया।