नई दिल्ली: गाजियाबाद में गंभीर रूप से घायल नाबालिग यौन उत्पीड़न पीड़िता को कथित तौर पर इलाज के लिए भर्ती नहीं करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। शुक्रवार को सुनवाई के दौरान दो अस्पतालों ने पीड़ित बच्ची के माता-पिता को कुल 12 लाख रुपये देने की पेशकश की। आरोप है कि अस्पतालों ने बच्ची को इलाज के लिए भर्ती नहीं किया था, जिसके बाद उसकी मौत हो गई।

अस्पतालों और पुलिस के रवैये पर नाराजगी

मामले की सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अस्पतालों और गाजियाबाद पुलिस की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई। CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची तथा वी. मोहन की पीठ ने कहा कि अदालत अस्पतालों के लिए 'मस्ट ट्रीट' यानी गंभीर मरीजों को इलाज देने की अनिवार्यता से जुड़ी गाइडलाइंस बनाने पर विचार कर सकती है।

अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि कानून और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों में मेडिकल संस्थानों की जिम्मेदारियां स्पष्ट होने के बावजूद जमीनी स्तर पर उनका पालन नहीं हो रहा है।

यौन उत्पीड़न मामलों में वीडियो रिकॉर्डिंग पर विचार

सुप्रीम कोर्ट ने यौन उत्पीड़न के मामलों में शिकायतकर्ताओं के बयानों की वीडियो रिकॉर्डिंग को पुलिस के लिए अनिवार्य बनाने की संभावना पर भी संकेत दिया। इसका उद्देश्य जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता, जवाबदेही और पीड़ितों के प्रति संवेदनशीलता सुनिश्चित करना है।

पीड़िता के माता-पिता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने अदालत को बताया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में इस संबंध में प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभावी तरीके से पालन नहीं किया जा रहा।

अस्पतालों के लिए 'मस्ट ट्रीट' व्यवस्था पर जोर

जस्टिस बागची ने सुनवाई के दौरान कहा कि कानून और सुप्रीम कोर्ट के आदेश मेडिकल संस्थानों के लिए जरूरतमंद मरीजों को इलाज उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी तय करते हैं, लेकिन वास्तविक स्थिति कानूनी प्रावधानों से काफी अलग दिखाई देती है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद अब अस्पतालों की जिम्मेदारी, आपातकालीन इलाज और यौन अपराध पीड़ितों के प्रति पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर व्यापक दिशानिर्देश तैयार किए जाने की संभावना है।

इस मामले में दो अस्पतालों की ओर से पीड़िता के माता-पिता को 12 लाख रुपये देने की पेशकश भी सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट की आगे की कार्यवाही पर सभी की नजर बनी हुई है।