वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के सबसे महत्वपूर्ण पर्वों में से एक माना जाता है। इस वर्ष यह व्रत 16 मई 2026 को मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह व्रत पति की लंबी आयु  सुख समृद्धि और अखंड सौभाग्य के लिए रखा जाता है। इस दिन महिलाएं वट वृक्ष की पूजा कर माता सावित्री और सत्यवान की कथा सुनती हैं। धर्म शास्त्रों में रंगों का विशेष महत्व बताया गया है। वट सावित्री पूजा में लाल  पीला  हरा और गुलाबी रंग की साड़ियां सबसे शुभ मानी जाती हैं। लाल रंग प्रेम  शक्ति और अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है  जबकि पीला रंग सुख शांति और समृद्धि का संकेत देता है। वहीं हरा रंग रिश्तों में स्थिरता और आपसी समझ को मजबूत करता है और गुलाबी रंग पति पत्नी के प्रेम और भावनात्मक जुड़ाव को बढ़ाने वाला माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि वट वृक्ष की 7 परिक्रमा सात जन्मों के अटूट वैवाहिक बंधन का प्रतीक होती है। पूजा के दौरान महिलाएं कच्चा सूत बांधते हुए मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि समृद्धये। वटसावित्री व्रतमहं करिष्ये॥  मंत्र का जाप करती हैं। माना जाता है कि यह मंत्र वैवाहिक जीवन में सुख और समृद्धि लाता है। वट सावित्री व्रत में कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना भी जरूरी माना गया है। काले  स्लेटी और गहरे नीले रंग की साड़ियों को अशुभ माना जाता है। इसके अलावा श्रृंगार में उधार की वस्तुओं का प्रयोग करने से भी बचने की सलाह दी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार व्रत  कथा और परिक्रमा के बिना वट सावित्री पूजा अधूरी मानी जाती है। स्कंद पुराण में भी इस व्रत के महत्व का उल्लेख मिलता है। कहा गया है कि जो महिला श्रद्धा और विधि विधान से वट सावित्री व्रत करती है  उसे अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है।