हजारीबाग: अमन, सौहार्द और सामाजिक भाईचारे के लिए पहचाने जाने वाले हजारीबाग में पिछले एक सप्ताह के दौरान लावारिस अवस्था में मिले सात शवों ने कई गंभीर सामाजिक प्रश्न खड़े कर दिए हैं। इनमें से पांच शवों की अब तक पहचान नहीं हो सकी है और वे शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल की मोर्चरी में पहचान के इंतजार में रखे गए हैं।
यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि समाज की संवेदनशीलता, मानवीय मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है। आखिर ऐसी क्या परिस्थितियां हैं कि लोग अज्ञात अवस्था में दम तोड़ रहे हैं और उनकी पहचान तक नहीं हो पा रही है?
अस्पताल परिसर से मिले दो अज्ञात शव, बढ़ी चिंता
इन घटनाओं में सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि दो शव अस्पताल परिसर से मिले। अस्पताल वह स्थान है जहां लोग जीवन बचाने की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं। ऐसे संवेदनशील परिसर में अज्ञात शवों का मिलना व्यवस्था और मानवीय संवेदनाओं दोनों पर सवाल खड़े करता है।
सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभा रहे सामाजिक कार्यकर्ता
इन शवों को पुलिस की मौजूदगी में मुक्तिधाम सेवा संस्थान के सचिव एवं वार्ड पार्षद प्रतिनिधि नीरज कुमार और उनकी टीम ने सम्मानपूर्वक उठाकर मोर्चरी तक पहुंचाया। कई शव दुर्गंधयुक्त और कठिन परिस्थितियों में मिले, फिर भी टीम ने मानवीय दायित्व निभाते हुए उन्हें सम्मान दिया।
हालांकि, बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल अंतिम संस्कार कर देना ही पर्याप्त है, या फिर उन सामाजिक कारणों की भी तलाश होनी चाहिए जिनकी वजह से लोग इस स्थिति तक पहुंच रहे हैं।
बढ़ती सामाजिक चुनौतियां
विशेषज्ञों का मानना है कि मानसिक तनाव, अवसाद, आर्थिक दबाव, नशे की बढ़ती प्रवृत्ति, पारिवारिक टूटन और सामाजिक दूरी जैसी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं। कई मामलों में दुर्घटनाग्रस्त या असहाय लोगों की मदद करने के बजाय लोग उन्हें नजरअंदाज कर आगे बढ़ जाते हैं।
ऐसी परिस्थितियां यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या समाज में संवेदनशीलता का स्तर लगातार कम होता जा रहा है।
समाज और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी
इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रशासन को सुनसान इलाकों और अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थानों पर निगरानी व्यवस्था मजबूत करनी होगी। वहीं सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों को भी जरूरतमंद लोगों की मदद और पुनर्वास की दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
मानसिक स्वास्थ्य, नशामुक्ति और सामाजिक संवाद को बढ़ावा देना भी समय की आवश्यकता है, ताकि कोई व्यक्ति अकेलेपन या लाचारी में इस स्थिति तक न पहुंचे।















