नई दिल्ली: कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने 'एक देश, एक चुनाव' (One Nation One Election) के प्रस्ताव पर सवाल उठाते हुए कहा है कि यह भारत की संसदीय प्रणाली और संघीय ढांचे के अनुरूप नहीं है। थरूर ने द हिंदू में लिखे अपने लेख में ONOE के प्रस्ताव का विश्लेषण करते हुए इसके संभावित प्रभावों पर विस्तार से अपनी राय रखी है।

'एक देश, एक चुनाव' संसदीय प्रणाली में फिट नहीं

शशि थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपने लेख को साझा करते हुए कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर एक चुनावी समय-सारणी लागू करने से अलग-अलग राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियों को केंद्र के चुनावी चक्र के साथ जोड़ने की कोशिश होगी।

उनके मुताबिक, प्रशासनिक सुविधा को लोकतांत्रिक मूल्यों से ऊपर रखना उचित नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि भारत का संसदीय लोकतंत्र राज्यों और केंद्र की अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों को स्वीकार करता है।

PM या CM तभी तक शासन करते हैं...

थरूर ने संसदीय प्रणाली की बुनियादी व्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री तब तक शासन करते हैं, जब तक उन्हें सदन का विश्वास प्राप्त रहता है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति प्रणाली के विपरीत संसदीय कार्यपालिका का अस्तित्व विधायी बहुमत पर निर्भर करता है। गठबंधन सरकार का गिरना, अविश्वास प्रस्ताव सफल होना या सदन में राजनीतिक समीकरण बदलना सरकार के कार्यकाल को प्रभावित कर सकता है।

1952 से 1967 तक साथ हुए थे चुनाव

थरूर ने अपने लेख में कहा कि भारत में 1952 से 1967 तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक ही समय-सारणी के आसपास होते थे। बाद में केंद्र और राज्यों में सरकारें अलग-अलग समय पर गिरती रहीं और उनके बाद अलग-अलग चुनाव हुए।

इसी प्रक्रिया के कारण आज किसी न किसी राज्य में लगभग हर वर्ष चुनाव होने की स्थिति बनी हुई है।

'निश्चित चुनावी कैलेंडर थोपना सही नहीं'

कांग्रेस नेता के मुताबिक, चुनाव के लिए निश्चित कार्यकाल का कैलेंडर लागू करना संसदीय जवाबदेही की प्रकृति को प्रभावित कर सकता है।

उन्होंने तर्क दिया कि अगर कोई सरकार अपना बहुमत खो देती है तो उस स्थिति में मतदाताओं को नई सरकार चुनने का अवसर मिलना चाहिए। निश्चित चुनावी समय-सारणी इस प्रक्रिया को सीमित कर सकती है।

ONOE पर थरूर ने जताई संघीय ढांचे को लेकर चिंता

थरूर ने कहा कि भारत का लोकतंत्र विकेंद्रीकृत संसदीय व्यवस्था पर आधारित है। उनके अनुसार, 'एक देश, एक चुनाव' के जरिए राज्यों के अलग-अलग राजनीतिक समय-चक्र को एक साथ करने की कोशिश संघीय व्यवस्था के लिए चुनौती पैदा कर सकती है।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि चुनावों को एक साथ कराने के पक्ष में दिए जाने वाले वित्तीय खर्च और प्रशासनिक व्यवधान संबंधी तर्कों के साथ-साथ संवैधानिक और लोकतांत्रिक पहलुओं पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।