हजारीबाग जिले का चूरचू इलाका कभी नक्सलियों का गढ़ माना जाता था। लेकिन आज यहां के आदिवासी परिवार मेहनत और प्राकृतिक संसाधनों के सहारे अपनी जिंदगी को नई दिशा दे रहे हैं। कम जरूरतों और ज्यादा खुशियों के साथ यहां के लोग खेती और पशुपालन के जरिए अपना जीवन यापन कर रहे हैं।यहां के ग्रामीण प्राकृतिक खेती के साथ-साथ पशुपालन को भी अपनी आय का मुख्य साधन बना चुके हैं। गांव के लोग मुर्गी पालन बकरी पालन और भैंस पालन के साथ साथ सूअर पालन भी करते हैं जो उनकी आय का अहम स्रोत बन गया है।स्थानीय लोगों का कहना है कि सूअर पालन ज्यादा कठिन काम नहीं है। सूअरों को रखने के लिए ग्रामीण करीब तीन फीट ऊंची दीवार बनाकर बाड़ा तैयार करते हैं जहां उन्हें रखा जाता है। इसी बाड़े में सूअर रहते हैं और घूमते भी हैं। दिन के समय उन्हें बाहर निकाल दिया जाता है जिससे वे खेतों में चरते रहते हैं और उनकी अच्छी ग्रोथ हो जाती है।खानपान के मामले में भी ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ता। ग्रामीण चावल के आटे का घोल बनाते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में पेज कहा जाता है। इसके अलावा खेतों में बचे फसल अवशेष और घर का बचा हुआ खाना भी सूअरों को खिलाया जाता है। इससे उनका वजन तेजी से बढ़ता है और पालन-पोषण भी आसान हो जाता है।ग्रामीणों का कहना है कि सूअर पालन से उन्हें अच्छी आमदनी हो जाती है जिससे परिवार का खर्च आसानी से चल जाता है। यही कारण है कि चूरचू इलाके में अब कई परिवार इस व्यवसाय से जुड़कर आत्मनिर्भर बन रहे हैं।आज यह इलाका जो कभी नक्सल गतिविधियों के लिए जाना जाता था अब मेहनत खेती और पशुपालन के जरिए आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रहा है।