झारखंड के बोकारो जिले में सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड CCL की कारो ओपन कास्ट विस्तारीकरण परियोजना के लिए लगभग 41 हजार से अधिक पेड़ों की कटाई को मंजूरी दिए जाने से पर्यावरण और सामाजिक संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस फैसले से न केवल क्षेत्र का पारिस्थितिक तंत्र प्रभावित होगा, बल्कि स्थानीय आदिवासी समुदायों और वन्यजीवों की आजीविका व अस्तित्व पर भी गहरा असर पड़ेगा।यह घना जंगल सदियों से मुंडा उरांव संताल समेत अन्य आदिवासी समुदायों का प्राकृतिक घर रहा है। आदिवासी परिवार महुआ सखुआ साल और अन्य पेड़ों से फल फूल पत्तियां औषधीय वनस्पतियां और लघु वन उत्पाद प्राप्त कर अपनी आजीविका चलाते हैं। जंगल कटने से उनकी खेती बाड़ी पशुपालन और दैनिक जीवन सीधे तौर पर प्रभावित होगा। जलस्रोत सूखने चारे की कमी और संभावित विस्थापन का खतरा भी बढ़ जाएगा, जिससे उनकी संस्कृति परंपराएं और पूजा स्थल संकट में पड़ सकते हैं।आदिवासियों का कहना है कि वे पीढ़ियों से जंगल के रक्षक रहे हैं लेकिन अब कोयला खनन के नाम पर उनके जल जंगल जमीन के अधिकार छीने जा रहे हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार यह सिर्फ एक औद्योगिक परियोजना नहीं बल्कि उनके अस्तित्व पर सीधा हमला है।इस क्षेत्र के जंगल हाथी हिरण जंगली सूअर पक्षियों और कई दुर्लभ वन्यजीवों का आश्रय स्थल हैं। बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से हाथियों के कॉरिडोर टूटेंगे जिससे वे गांवों की ओर भटक सकते हैं और मानव वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ सकती हैं। जैव विविधता को नुकसान मिट्टी का कटाव और वर्षा चक्र में असंतुलन जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं।करीब 400 करोड़ रुपये की इस परियोजना को लेकर कंपनी का दावा है कि इससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और क्षेत्र का आर्थिक विकास होगा। हालांकि वन विभाग से एनओसी मिलने के बावजूद ग्रामीण और स्थानीय लोग इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। जंगल बचाने के लिए आंदोलन भी किए गए हैं और लोगों का कहना है कि विकास की यह कीमत बहुत भारी साबित हो सकती है।