नई दिल्ली: दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले आदिवासी समुदायों की अपनी विशिष्ट भाषा, संस्कृति, परंपराएं, खान-पान और जीवनशैली है। प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों से गहरे जुड़ाव के बावजूद आदिवासी समुदाय लंबे समय से सामाजिक, आर्थिक और विकास से जुड़ी कई चुनौतियों का सामना करते रहे हैं। इन्हीं समुदायों के अधिकारों, संस्कृति और पहचान के संरक्षण के प्रति वैश्विक स्तर पर जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से हर साल 9 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस मनाया जाता है।
क्यों मनाया जाता है 9 अगस्त को आदिवासी दिवस?
9 अगस्त 1982 को संयुक्त राष्ट्र में आदिवासी आबादी से जुड़े मुद्दों पर कार्य करने वाले कार्यकारी समूह की पहली बैठक हुई थी। इसी ऐतिहासिक अवसर की याद में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर 1994 में 9 अगस्त को विश्व के आदिवासी लोगों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस घोषित किया।
इसके बाद हर साल 9 अगस्त को दुनिया भर में आदिवासी समुदायों के अधिकारों, संस्कृति और उनके सामने मौजूद चुनौतियों को लेकर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
आदिवासी समुदाय और प्रकृति का गहरा संबंध
आदिवासी समाज की जीवनशैली सदियों से जंगल, जमीन, पहाड़ और जलस्रोतों से जुड़ी रही है। इनके कई पर्व-त्योहार, धार्मिक मान्यताएं और पारंपरिक रीति-रिवाज प्रकृति पर आधारित हैं।
आधुनिक विकास, जंगलों के घटते क्षेत्र और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव के कारण कई आदिवासी समुदायों के सामने अपनी पारंपरिक संस्कृति और पहचान को सुरक्षित रखने की चुनौती भी बढ़ी है।
भाषाई विविधता भी आदिवासी समुदायों की महत्वपूर्ण पहचान है। दुनिया के कई आदिवासी समुदायों की भाषाएं संरक्षण के अभाव में विलुप्ति के खतरे का सामना कर रही हैं। ऐसे में उनकी भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना भी इस दिवस के महत्वपूर्ण उद्देश्यों में शामिल है।
1977 के सम्मेलन ने भी निभाई अहम भूमिका
आदिवासी समुदायों के अधिकारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से उठाने के प्रयास इससे पहले भी होते रहे हैं। 1977 में जिनेवा में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में आदिवासी समुदायों के अधिकारों, पहचान और उनके साथ होने वाले भेदभाव जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई थी।
इन वैश्विक प्रयासों ने आने वाले वर्षों में आदिवासी अधिकारों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रमुखता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारत में बड़ी आदिवासी आबादी
भारत में भी बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय रहते हैं। झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात समेत कई राज्यों में अलग-अलग जनजातीय समुदायों की आबादी है।
झारखंड में संथाल, मुंडा, उरांव, हो, खड़िया, बिरहोर और पहाड़िया सहित कई जनजातीय समुदाय अपनी विशिष्ट परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के साथ रहते हैं।
वहीं मध्य प्रदेश और आसपास के राज्यों में गोंड, भील, बैगा, सहरिया और कोरकू जैसे प्रमुख आदिवासी समुदाय पाए जाते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस का उद्देश्य क्या है?
अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस केवल आदिवासी संस्कृति और परंपराओं का उत्सव मनाने का दिन नहीं है। इसका उद्देश्य आदिवासी समुदायों के अधिकार, सम्मान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक विकास और सांस्कृतिक संरक्षण जैसे मुद्दों पर ध्यान आकर्षित करना भी है।
यह दिन दुनिया को याद दिलाता है कि विकास के साथ आदिवासी समाज की पहचान, उनकी भाषाओं, परंपराओं और प्रकृति के साथ उनके पारंपरिक संबंधों का संरक्षण भी जरूरी है।
9 अगस्त इसलिए सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि दुनिया के आदिवासी समुदायों की पहचान, अधिकार और सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने का अवसर है।














