रांची: कुड़मी समाज एक बार फिर बड़े आंदोलन और महाजुटान की तैयारी में है। करम पर्व के अवसर पर 20 सितंबर 2026 को झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा से जुड़े कुड़मी समाज के लोग बड़े स्तर पर जुटने की तैयारी में हैं। इस महाजुटान को सामाजिक एकजुटता के साथ-साथ सांस्कृतिक और राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के तौर पर देखा जा रहा है।

महाजुटान का प्रमुख एजेंडा कुड़मालि भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने और कुड़मी समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची में शामिल करने की मांग को मजबूती से उठाना है। आयोजकों की कोशिश है कि बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी के जरिए कुड़मी समाज की भाषा, संस्कृति और पहचान से जुड़े मुद्दों को केंद्र सरकार तक पहुंचाया जाए।

20 सितंबर को दो प्रमुख स्थानों पर बड़ा समागम

20 सितंबर को कुड़मी समाज की ओर से पश्चिम बंगाल के पुरुलिया स्थित कड़ाडिटाँइड़ और झारखंड के कोड़ाडीह में बड़े समागम की तैयारी की जा रही है। इसमें बड़ी संख्या में समाज के लोगों के शामिल होने की संभावना है।

इस महाजुटान के जरिए कुड़मी समाज अपनी सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं और सामाजिक एकजुटता का प्रदर्शन करेगा। कार्यक्रम को लेकर राजनीतिक गतिविधियां भी तेज होने की संभावना है।

महाजुटान के एजेंडे में भाषा और ST दर्जे का मुद्दा

कुड़मी समाज के महाजुटान के प्रमुख मुद्दों में कुड़मालि भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराना शामिल है। समाज का मानना है कि भाषा को संवैधानिक मान्यता मिलने से उसकी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को मजबूती मिलेगी।

इसके अलावा कुड़मी समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने की मांग भी लंबे समय से आंदोलन का प्रमुख मुद्दा रही है। महाजुटान के माध्यम से इन मांगों को फिर से राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से उठाने की तैयारी है।

पिछले वर्षों में भी बड़े आंदोलन कर चुका है कुड़मी समाज

कुड़मी समाज के आंदोलन का सिलसिला पिछले कुछ वर्षों में कई बार देखने को मिला है। सितंबर 2022 में झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के कई रेलवे स्टेशनों पर बड़ा रेल रोको आंदोलन हुआ था।

इसके बाद अप्रैल 2023 में भी आंदोलन का व्यापक असर देखने को मिला। 5 अप्रैल से करीब पांच दिनों तक रेल चक्का जाम किया गया था। इन आंदोलनों के जरिए कुड़मी समाज ने अपनी मांगों को केंद्र और राज्य सरकारों तक पहुंचाने की कोशिश की।

2023 और 2025 में भी 'रेल टेका-डहर छेंका' आंदोलन

कुड़मी समाज ने वर्ष 2023 और 2025 में भी 20 सितंबर को 'रेल टेका-डहर छेंका' आंदोलन के जरिए अपनी मांगों को प्रमुखता से उठाया। इन आंदोलनों में भाषा, सामाजिक पहचान और ST दर्जे की मांग प्रमुख रही। लगातार होने वाले आंदोलनों से यह संकेत मिलता है कि कुड़मी समाज अपने सामाजिक और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर लंबे समय से संगठित तरीके से आवाज उठाता रहा है।

टोटेमिक और आदिम पहचान को सामने रखने की कोशिश

20 सितंबर के महाजुटान का एक महत्वपूर्ण पहलू कुड़मी समाज की 'टोटेमिक' और आदिम पहचान को देश के सामने मजबूती से रखने की कोशिश भी है। समाज की सांस्कृतिक परंपराओं, लोक जीवन, भाषा और रीति-रिवाजों को कार्यक्रम के जरिए प्रदर्शित करने की तैयारी है। आयोजकों का उद्देश्य महाजुटान को केवल राजनीतिक मांगों तक सीमित रखने के बजाय इसे सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान के बड़े मंच के रूप में प्रस्तुत करना है।

तीन राज्यों के मुख्यमंत्री हो सकते हैं शामिल

महाजुटान में झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के मुख्यमंत्रियों के शामिल होने की संभावना भी जताई जा रही है। हालांकि, अंतिम रूप से किस-किस प्रमुख राजनीतिक हस्ती की मौजूदगी होगी, इसे लेकर आधिकारिक तस्वीर कार्यक्रम के करीब आने पर स्पष्ट हो सकती है। कुड़मी समाज की बड़ी आबादी इन तीन राज्यों में मौजूद है। ऐसे में महाजुटान राजनीतिक दलों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

कुड़मी समाज में पैठ मजबूत करने की कोशिश में राजनीतिक दल

कुड़मी समाज के बड़े जनाधार को देखते हुए राजनीतिक दलों की नजर भी इस महाजुटान पर रहेगी। आगामी राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से भी यह आयोजन महत्वपूर्ण हो सकता है।

महाजुटान में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी होती है तो यह कुड़मी समाज की राजनीतिक और सामाजिक एकजुटता का बड़ा संदेश माना जाएगा। साथ ही राजनीतिक दलों के लिए भी इस समुदाय के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश का एक अहम अवसर बन सकता है।

20 सितंबर का महाजुटान क्यों है अहम?

कुड़मी समाज के लिए 20 सितंबर 2026 का महाजुटान कई मायनों में महत्वपूर्ण है। एक ओर जहां इसके जरिए ST दर्जे की मांग को मजबूती से उठाने की तैयारी है, वहीं दूसरी ओर कुड़मालि भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की मांग भी प्रमुखता से सामने रखी जाएगी।

इसके अलावा यह आयोजन कुड़मी समाज की भाषा, संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक पहचान को व्यापक स्तर पर प्रदर्शित करने का मंच बनेगा। अब देखना होगा कि 20 सितंबर का यह महाजुटान कितना बड़ा होता है और केंद्र व राज्य सरकारों पर इसका कितना राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव पड़ता है।