नई दिल्ली/बर्लिन: जलवायु परिवर्तन और कार्बन उत्सर्जन को लेकर भारत और यूरोपीय संघ के बीच मतभेद एक बार फिर चर्चा में हैं। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जर्मनी की राजधानी बर्लिन में विकसित देशों के ऐतिहासिक कार्बन उत्सर्जन पर सवाल उठाते हुए कहा कि पर्यावरणीय संकट के लिए भारत जैसे विकासशील देशों को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि जलवायु नीतियां बनाते समय देशों के ऐतिहासिक उत्सर्जन, प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन और विकास संबंधी जरूरतों को भी ध्यान में रखना चाहिए।

गोयल ने सवाल उठाया कि जब औद्योगिक विकास के दौरान विकसित देशों ने बड़ी मात्रा में कार्बन उत्सर्जित किया, तो अब भारत जैसे देशों पर समान शर्तें लागू करना कितना उचित है। उनका कहना है कि पर्यावरण संरक्षण के साथ भारत की ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और करोड़ों लोगों की बुनियादी जरूरतों का भी ध्यान रखना जरूरी है।

‘ऐतिहासिक उत्सर्जन की जिम्मेदारी भी तय हो’

बर्लिन में अपने संबोधन के दौरान गोयल ने विकसित देशों के ऐतिहासिक उत्सर्जन का मुद्दा उठाया। उन्होंने सवाल किया कि वायुमंडल में बड़ी मात्रा में कार्बन किसने छोड़ा और ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने में किन देशों की भूमिका रही।

गोयल के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन से निपटने की जिम्मेदारी सभी देशों की है, लेकिन इसे तय करते समय उनके अतीत के उत्सर्जन और वर्तमान परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि भारत अभी भी अपनी बड़ी आबादी को बिजली, परिवहन और अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए काम कर रहा है।

दुनिया की 17% आबादी, उत्सर्जन में भारत की हिस्सेदारी 3% से कम होने का दावा

गोयल ने भारत की आबादी और वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में उसकी हिस्सेदारी का जिक्र करते हुए कहा कि भारत दुनिया की लगभग 17 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में उसका योगदान तीन प्रतिशत से कम है।

उन्होंने यह भी कहा कि यूरोप में प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन भारत की तुलना में काफी अधिक है। उनके अनुसार, प्रति व्यक्ति उत्सर्जन और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव के अंतर को ध्यान में रखे बिना सभी देशों पर एक जैसे नियम लागू करना उचित नहीं होगा।

यहां ध्यान देने वाली बात है कि कुल उत्सर्जन, प्रति व्यक्ति उत्सर्जन और ऐतिहासिक उत्सर्जन अलग-अलग मानक हैं। किसी देश की स्थिति का आकलन करते समय इन सभी पहलुओं को अलग-अलग देखना जरूरी है।

स्वच्छ ऊर्जा और सर्कुलर इकोनॉमी पर भारत का जोर

गोयल ने कहा कि भारत विकास की जरूरतों को पूरा करने के साथ स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने की दिशा में भी काम कर रहा है। उनके मुताबिक, देश पर्यावरण संरक्षण, संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल और सर्कुलर इकोनॉमी को प्राथमिकता दे रहा है।

सर्कुलर इकोनॉमी ऐसी व्यवस्था है, जिसमें उत्पादों और संसाधनों का दोबारा इस्तेमाल तथा रीसाइक्लिंग करके कचरा कम करने की कोशिश की जाती है। उदाहरण के तौर पर, इस्तेमाल की गई धातुओं को दोबारा उत्पादन में शामिल करना या औद्योगिक कचरे से नए उत्पाद तैयार करना।

गोयल का तर्क है कि भारत को आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाकर चलना होगा। देश की बड़ी आबादी की ऊर्जा और खाद्य जरूरतों को पूरा करने के साथ उत्सर्जन कम करना भी एक अहम चुनौती है।

यूरोपीय संघ के कार्बन टैक्स पर भारत की चिंता

गोयल की टिप्पणी यूरोपीय संघ की कार्बन सीमा समायोजन व्यवस्था यानी कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) को लेकर भारत की चिंताओं के बीच आई है। यह व्यवस्था यूरोपीय संघ में आयात होने वाले कुछ उत्पादों के उत्पादन के दौरान हुए कार्बन उत्सर्जन से जुड़ी लागत लागू करती है।

इसके दायरे में लोहा और इस्पात, एल्युमीनियम, सीमेंट, उर्वरक, हाइड्रोजन और बिजली जैसी श्रेणियां शामिल हैं। यूरोपीय संघ का कहना है कि इस व्यवस्था का उद्देश्य आयातित उत्पादों और यूरोप में बने उत्पादों के बीच कार्बन लागत के अंतर को कम करना तथा कम उत्सर्जन वाली उत्पादन तकनीकों को प्रोत्साहित करना है।

भारत को आशंका है कि इस व्यवस्था के कारण भारतीय उत्पादों की लागत बढ़ सकती है। इससे यूरोपीय बाजार में भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा प्रभावित होने की संभावना है।

भारतीय इस्पात उद्योग पर क्यों पड़ सकता है असर?

CBAM भारतीय इस्पात उद्योग के लिए खास महत्व रखता है। भारत से यूरोप जाने वाले इस्पात और दूसरे औद्योगिक उत्पादों पर उत्पादन के दौरान हुए उत्सर्जन के आधार पर अतिरिक्त लागत लगने से उनकी कीमत बढ़ सकती है।

इसका असर भारतीय कंपनियों के मुनाफे और यूरोपीय बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धा पर पड़ सकता है। इस्पात का इस्तेमाल निर्माण, रेलवे, पुल, मशीनरी और कई अन्य उद्योगों में होता है। ऐसे में उत्पादन लागत में बढ़ोतरी का प्रभाव औद्योगिक आपूर्ति शृंखला के दूसरे हिस्सों पर भी पड़ सकता है।

भारत की प्रमुख चिंता यह है कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर लागू किए जाने वाले नियम विकासशील देशों के उद्योगों पर असमान आर्थिक बोझ न डालें।

जलवायु परिवर्तन पर साझा, लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों का सिद्धांत

जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय चर्चा में ‘साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियां और संबंधित क्षमताएं’ एक अहम सिद्धांत है। इसका अर्थ है कि सभी देशों को जलवायु संकट से निपटने में योगदान देना चाहिए, लेकिन उनकी जिम्मेदारियों और क्षमताओं का आकलन ऐतिहासिक उत्सर्जन, आर्थिक स्थिति और विकास संबंधी जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

भारत लंबे समय से विकसित देशों से विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को स्वच्छ तकनीक और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने की मांग करता रहा है। भारत का पक्ष है कि उत्सर्जन कम करने के लिए उद्योगों में बदलाव जरूरी हैं, लेकिन इसके लिए आवश्यक निवेश और तकनीक तक पहुंच भी महत्वपूर्ण है।

गोयल के बयान का मुख्य संदेश यही है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने में भारत सहयोग के लिए तैयार है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय नियम बनाते समय ऐतिहासिक जिम्मेदारियों और विकासशील देशों की परिस्थितियों को भी महत्व दिया जाना चाहिए।