रांची: झारखंड में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई अब केवल हथियार डालने और आत्मसमर्पण तक सीमित नहीं है। हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वाले पूर्व नक्सलियों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं। कभी नक्सली दस्तों की कमान संभालने वाले कुंदन पाहन, महाराज प्रमाणिक और मुकेश गंझू अब रोजगारपरक प्रशिक्षण लेकर नई जिंदगी की तैयारी कर रहे हैं।

हजारीबाग स्थित आत्मसमर्पित नक्सली बंदी कारा (ओपन जेल) में 60 महिला और पुरुष बंदियों को 45 दिनों तक मुर्गी पालन तथा सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण पूरा होने पर जेल आईजी सुदर्शन मंडल ने सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र प्रदान किए।

इस कार्यक्रम का आयोजन भारत सरकार के कौशल विकास मंत्रालय के अधीन कार्यरत जन शिक्षण संस्थान, हजारीबाग की ओर से किया गया था।

कुंदन पाहन: 128 मामलों से मुर्गी पालन के प्रशिक्षण तक

झारखंड के नक्सली इतिहास में कुंदन पाहन का नाम लंबे समय तक सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती रहा। मई 2017 में आत्मसमर्पण के समय उसके खिलाफ पुलिस रिकॉर्ड में 128 मामले दर्ज थे। उस पर तत्कालीन विधायक रमेश सिंह मुंडा और विशेष शाखा के इंस्पेक्टर फ्रांसिस इंदवार की हत्या समेत कई गंभीर वारदातों में शामिल होने के आरोप थे।

बैंक की कैश वैन से करोड़ों रुपये की लूट के मामले में भी उसका नाम सामने आया था। आत्मसमर्पण के समय उस पर 15 लाख रुपये का इनाम घोषित था।

कभी हथियारबंद दस्ते के साथ जंगलों में सक्रिय रहा कुंदन पाहन अब मुर्गी पालन का प्रशिक्षण पूरा कर चुका है। यह बदलाव उसके पुनर्वास की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।

महाराज प्रमाणिक पर भी दर्ज थे 120 से अधिक मामले

पूर्व नक्सली कमांडर महाराज प्रमाणिक का अतीत भी कई गंभीर आपराधिक आरोपों से जुड़ा रहा है। जनवरी 2022 में आत्मसमर्पण के वक्त उसके खिलाफ 120 से अधिक मामले दर्ज होने की जानकारी सामने आई थी। इनमें हत्या, लूट, रंगदारी, लेवी वसूली और आर्म्स एक्ट से संबंधित मामले शामिल थे।

वह चांडिल-बुंडू क्षेत्र में सक्रिय नक्सली संगठन का प्रमुख सदस्य और जोनल कमांडर रहा था। आत्मसमर्पण के दौरान उसने एके-47 राइफल, वायरलेस सेट और गोला-बारूद भी पुलिस को सौंपे थे।

अब महाराज प्रमाणिक भी हजारीबाग के ओपन जेल में मुर्गी पालन का प्रशिक्षण पूरा कर चुके हैं। हिंसक अतीत से बाहर निकलकर आजीविका का नया रास्ता तलाशने की यह कोशिश पुनर्वास कार्यक्रम का अहम हिस्सा है।

13 साल की उम्र में थामा था हथियार, अब रोजगार की तैयारी

टीएसपीसी के पूर्व सेकेंड कमांडर मुनेश्वर गंझू उर्फ मुकेश गंझू की कहानी भी कम चौंकाने वाली नहीं है। उसने महज 13 साल की उम्र में भाकपा माओवादी संगठन के बाल दस्ते में कदम रखा था।

वर्ष 2021 में उसने चतरा पुलिस के समक्ष हथियारों के साथ आत्मसमर्पण किया था। उस पर 15 लाख रुपये का इनाम घोषित था। पत्रकार इंद्रदेव यादव हत्याकांड, पुलिस पर हमले, लेवी वसूली और टेरर फंडिंग से जुड़े मामलों में भी उसका नाम आया था।

संगठन खड़ा करने से सेकेंड कमांडर बनने तक का सफर

मुकेश गंझू का नक्सली संगठन से जुड़ाव काफी पुराना रहा है। वर्ष 2004 में ब्रजेश गंझू के साथ उसने अन्य सहयोगियों के जरिए आरसीसी नामक संगठन के गठन में भूमिका निभाई थी। बाद में संगठन का नाम बदलकर टीपीसी और फिर टीएसपीसी हुआ।

संगठन में अपनी पकड़ मजबूत करते हुए मुकेश सेकेंड कमांडर के पद तक पहुंच गया था। अब वह भी मुर्गी पालन का प्रशिक्षण लेकर रोजगार की दिशा में कदम बढ़ा चुका है।

22 महिला बंदी सीख रहीं ब्यूटीशियन का हुनर

ओपन जेल में पुनर्वास की यह पहल पुरुष बंदियों तक सीमित नहीं है। आत्मसमर्पित महिला बंदियों को भी आत्मनिर्भर बनाने के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाया जा रहा है।

इसके तहत 22 महिला बंदियों को 80 दिवसीय ब्यूटीशियन प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद वे ब्यूटी पार्लर में काम करने के साथ अपना छोटा व्यवसाय शुरू करने की दिशा में भी आगे बढ़ सकती हैं।

इस पहल का उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना और उन्हें सम्मानजनक आजीविका के अवसर उपलब्ध कराना है।

30 बंदियों को सिखाई जा रही केंचुआ खाद बनाने की तकनीक

रोजगार के विकल्पों का दायरा बढ़ाने के लिए 30 अन्य बंदियों को वर्मी कंपोस्ट यानी केंचुआ खाद तैयार करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इस तकनीक के जरिए जैविक खाद का उत्पादन कर छोटे स्तर पर व्यवसाय शुरू किया जा सकता है।

मुर्गी पालन, सिलाई-कढ़ाई, ब्यूटीशियन और वर्मी कंपोस्ट जैसे अलग-अलग प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से बंदियों को उनकी रुचि और क्षमता के अनुरूप रोजगार के विकल्पों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

जेल से बाहर निकलने के बाद भी बड़ी होगी चुनौती

आत्मसमर्पण के बाद पूर्व नक्सलियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सामान्य सामाजिक जीवन में वापसी और स्थायी आजीविका हासिल करना है। वर्षों तक हिंसक गतिविधियों से जुड़े रहने के बाद परिवार, समाज और रोजगार की दुनिया में अपनी जगह बनाना आसान नहीं होता।

ऐसे में केवल प्रमाण पत्र देना पर्याप्त नहीं होगा। प्रशिक्षण के बाद बाजार से जुड़ाव, आर्थिक सहायता और रोजगार शुरू करने के लिए जरूरी संसाधन उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण होगा। तभी यह पहल स्थायी पुनर्वास का रूप ले सकेगी।

जेल आईजी बोले- मुख्यधारा से जुड़कर भविष्य संवार रहे पूर्व नक्सली

झारखंड के जेल आईजी सुदर्शन मंडल ने बताया कि राज्य की आत्मसमर्पण नीति का सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे रहा है। कभी हथियारों के दम पर व्यवस्था बदलने का सपना देखने वाले नक्सली अब मुख्यधारा से जुड़कर अपनी आजीविका के लिए मेहनत कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि कुंदन पाहन, महाराज प्रमाणिक और मुकेश गंझू जैसे पूर्व नक्सलियों को रोजगारपरक प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि जेल से बाहर निकलने के बाद वे अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें और सम्मानजनक जीवन जी सकें।