IAS सुधीर त्रिपाठी की पहली पोस्टिंग का दिलचस्प किस्सा, पैर फिसला तो ‘जग्गू’ बन गया ‘जग्गू दादा’
रांची: झारखंड के पूर्व मुख्य सचिव और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी सुधीर त्रिपाठी ने दशहरा के मौके पर अपनी प्रशासनिक सेवा के शुरुआती दिनों का एक दिलचस्प संस्मरण साझा किया है। सोशल मीडिया पर लिखे अपने अनुभव में उन्होंने बताया कि कैसे कोडरमा में पहली पोस्टिंग के दौरान अवैध वसूली रोकने की कोशिश एक स्थानीय बदमाश के लिए शोहरत का किस्सा बन गई। सड़क पर जबरन वसूली करने वाले ‘जग्गू’ ने बाद में इसी घटना के आधार पर अपना नाम ‘जग्गू दादा’ रख लिया। सुधीर त्रिपाठी ने बताया कि 28 सितंबर 1987 को उन्हें भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में पहली पोस्टिंग कोडरमा में अनुमंडल पदाधिकारी (SDO) के रूप में मिली थी। दशहरा का समय था और त्योहार के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना उनके सामने शुरुआती चुनौतियों में से एक था। कोडरमा को सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील नहीं मानते हुए अनुमंडल में सामान्य सुरक्षा बलों की तैनाती की गई थी। त्रिपाठी के मुताबिक, उस समय पटना-रांची राष्ट्रीय राजमार्ग कोडरमा से होकर गुजरता था। त्योहारों के दौरान कुछ स्थानीय बदमाश सड़कों पर अस्थायी बैरियर लगाकर गुजरने वाले वाहनों से जबरन पैसे वसूलते थे। राष्ट्रीय राजमार्ग पर प्रशासन ने 24 घंटे गश्त की व्यवस्था कर इस समस्या पर काफी हद तक नियंत्रण पा लिया था, लेकिन अंदरूनी सड़कों पर अवैध वसूली जारी थी। दशहरा से करीब पांच दिन पहले उन्हें सूचना मिली कि दो प्रखंड मुख्यालयों को जोड़ने वाली सड़क पर स्थानीय थाने की कथित मिलीभगत से अवैध बैरियर लगाकर वसूली की जा रही है। सूचना मिलते ही उन्होंने मौके पर पहुंचकर कार्रवाई करने का फैसला किया। मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी से प्रशिक्षण लेकर आए सुधीर त्रिपाठी को अपनी शारीरिक फिटनेस पर काफी भरोसा था। वह मौके पर पहुंचे तो अपने निजी सुरक्षा अधिकारी (PSO) और हाउस गार्ड के जीप से उतरने का इंतजार किए बिना खुद ही गाड़ी से कूद पड़े और बैरियर लगाने वाले जग्गू की ओर बढ़े। एसडीओ को अपनी ओर आते देख जग्गू भागने लगा। त्रिपाठी ने उसे पकड़ने के लिए पीछा किया, लेकिन सड़क पर पड़े कंक्रीट और बजरी के कारण उनका पैर फिसल गया। इस दौरान उनके हाथ-पैर छिल गए। उनके सुरक्षा कर्मियों ने भी जग्गू को पकड़ने की कोशिश की, लेकिन वह हाथ नहीं आया। हालांकि, त्रिपाठी ने मौके पर लगाया गया अवैध बैरियर हटवा दिया। इसके बाद वह थाने पहुंचे और संबंधित थाना प्रभारी को फटकार लगाते हुए 12 घंटे के भीतर जग्गू के खिलाफ मामला दर्ज करने का निर्देश दिया। फिर वह अपने हाथ-पैर की मरहम-पट्टी कराने अनुमंडलीय अस्पताल चले गए। सुधीर त्रिपाठी के संस्मरण के अनुसार, कुछ ही घंटों के भीतर जग्गू को पकड़ लिया गया और उसे जेल भेज दिया गया। वहां भी वह दूसरे कैदियों के बीच अपनी धाक जमाने की कोशिश करता था। वह कहता था कि उसे पकड़ने के लिए खुद एसडीओ उसके पीछे दौड़े थे। जग्गू ने इस घटना को अपने लिए प्रतिष्ठा का विषय बना लिया। जमानत पर छूटने के बाद जब उसे पता चला कि उसका पीछा करते समय सुधीर त्रिपाठी भी घायल हो गए थे और उन्हें अस्पताल जाना पड़ा था, तो उसने अपना नाम ‘जग्गू’ से बदलकर ‘जग्गू दादा’ रख लिया। इसके बाद वह इसी घटना का हवाला देकर अपनी धाक जमाता था कि वह वही व्यक्ति है, जिसके पीछे खुद एसडीओ दौड़े थे और जिन्हें अस्पताल जाना पड़ा था।1987 में कोडरमा में हुई थी पहली पोस्टिंग
अवैध बैरियर लगाकर की जा रही थी जबरन वसूली
जग्गू को पकड़ने के दौरान फिसला पैर
जेल से छूटने के बाद जग्गू ने रख लिया नया नाम















