रांची: कहते हैं कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती। इस कहावत को डॉ. कुमार अशोक ने अपनी जिंदगी में उतारकर दिखाया है। कोल इंडिया की अनुषंगी कंपनी नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (NCL) में महाप्रबंधक (GM) रह चुके डॉ. अशोक ने करीब 68 साल की उम्र में रांची विश्वविद्यालय के पीजी मनोविज्ञान विभाग में दाखिला लिया है। लंबे पेशेवर जीवन और दो संस्थानों से सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका पढ़ने का जुनून कम नहीं हुआ है। अब वे नियमित रूप से कक्षाओं में पहुंचकर मनोविज्ञान की पढ़ाई कर रहे हैं।

रिटायरमेंट के बाद चुनी पढ़ाई की नई राह

डॉ. कुमार अशोक 30 सितंबर 2018 को नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड से सेवानिवृत्त हुए थे। इसके बाद उन्होंने जेपी ग्रुप, सिंगरौली में उपाध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएं दीं। वर्ष 2025 में वहां से भी सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने एक बार फिर पढ़ाई की दुनिया में कदम रखा और रांची विश्वविद्यालय के पीजी साइकोलॉजी विभाग में सेमेस्टर वन में नामांकन कराया।

उनका यह फैसला बताता है कि शिक्षा को केवल नौकरी या करियर तक सीमित नहीं रखा जा सकता। जिंदगी के किसी भी पड़ाव पर नई चीजें सीखने और अपने ज्ञान को विस्तार देने की शुरुआत की जा सकती है।

साइंस से इंजीनियरिंग तक, अब मनोविज्ञान की बारी

डॉ. अशोक की शैक्षणिक यात्रा विज्ञान से शुरू हुई। उन्होंने वर्ष 1975 में साइंस कॉलेज, पटना से मैट्रिक की परीक्षा पास की। इसके बाद एनआईटी जयपुर से बीटेक और आईएसएम धनबाद से एमटेक किया। उन्होंने पीएचडी की डिग्री भी हासिल की।

पेशेवर जीवन के दौरान उन्होंने कोयला क्षेत्र की विभिन्न संस्थाओं में काम किया। वर्ष 1996 में वे सीएमपीडीआई के रांची मुख्यालय में कार्यरत रहे। इसके बाद धनबाद और महानदी कोलफील्ड्स में भी सेवाएं दीं। करियर के इस लंबे सफर में उन्होंने तकनीकी क्षेत्र में अनुभव हासिल किया, लेकिन अब उनकी दिलचस्पी मानव व्यवहार और मनोविज्ञान को समझने में है।

पढ़ाई के बाद समाज के लिए करना चाहते हैं काम

डॉ. कुमार अशोक का लक्ष्य केवल एक और डिग्री हासिल करना नहीं है। वे मनोविज्ञान की पढ़ाई पूरी करने के बाद सामाजिक कार्यों और जागरूकता से जुड़े प्रयासों में योगदान देना चाहते हैं। उनके लिए शिक्षा ज्ञान बढ़ाने के साथ-साथ समाज और इंसानी व्यवहार को बेहतर तरीके से समझने का माध्यम भी है।

यही वजह है कि सेवानिवृत्ति के बाद आराम करने के बजाय उन्होंने पढ़ाई का रास्ता चुना। उनका यह कदम उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो उम्र या जिम्मेदारियों का हवाला देकर नई शुरुआत करने से पीछे हट जाते हैं।

विश्वविद्यालय ने भी बताया प्रेरणादायक कदम

रांची विश्वविद्यालय के पीजी मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष, सोशल साइंस डीन और रिसर्च डायरेक्टर डॉ. परवेज हसन ने बताया कि डॉ. कुमार अशोक ने सेवानिवृत्ति के बाद विश्वविद्यालय में दाखिला लिया है।

उनके मुताबिक, एक वरिष्ठ इंजीनियर का मनोविज्ञान की पढ़ाई के लिए आगे आना इस बात का उदाहरण है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती। तकनीकी क्षेत्र का अनुभव और मनोविज्ञान की समझ मिलकर समाज को देखने का एक नया नजरिया दे सकते हैं।

डॉ. कुमार अशोक की कहानी यही संदेश देती है कि पढ़ाई किसी उम्र, पद या पेशे की मोहताज नहीं है। अगर सीखने की इच्छा कायम हो, तो जिंदगी के किसी भी मोड़ पर नई शुरुआत की जा सकती है।