रांची:  झारखंड में आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व और अधिकारों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने कहा है कि परिसीमन का मुद्दा किसी दूसरे विषय में भटकने नहीं दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को लेकर राष्ट्रपति, सभी राजनीतिक दलों और संबंधित संवैधानिक संस्थाओं को ज्ञापन सौंपा जाएगा।

मंगलवार को बंधु तिर्की के आवास पर आयोजित संवाददाता सम्मेलन में पूर्व मेयर रमा खलखो, सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला, लक्ष्मी नारायण मुंडा, केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष अजय तिर्की, कांग्रेस युवा अध्यक्ष शशि पन्ना, ज्योत्स्ना केरकेट्टा और शिवा कच्छप समेत कई लोग मौजूद रहे।

मोरहाबादी की महाजुटान रैली का किया जिक्र

बंधु तिर्की ने कहा कि 30 अगस्त को मोरहाबादी मैदान में आयोजित आदिवासी एकता महाजुटान रैली सफल रही। उन्होंने रैली में शामिल हुए लोगों के प्रति आभार जताते हुए कहा कि इसका मुख्य उद्देश्य परिसीमन के मुद्दे पर आदिवासी समाज की आवाज को मजबूती से सामने रखना था।

उन्होंने कहा कि परिसीमन केवल चुनावी सीटों की संख्या का विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व और भविष्य की राजनीतिक हिस्सेदारी से है।

विधानसभा सीटें बढ़ाने की मांग

बंधु तिर्की ने कहा कि झारखंड में आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को मजबूत करने के लिए विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ाने पर विचार होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि राज्य में पांचवीं अनुसूची के प्रावधान लागू हैं, इसके बावजूद विस्थापन और आदिवासी अधिकारों से जुड़े सवाल लगातार बने हुए हैं। उन्होंने बताया कि इन मुद्दों को लेकर कानून मंत्री से भी मुलाकात की जाएगी।

इसके अलावा राष्ट्रपति और देश के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों को ज्ञापन सौंपने की बात कही गई। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज से जुड़े पांच प्रस्ताव संसद के समक्ष भी रखे जाएंगे और प्रस्ताव का ड्राफ्ट संबंधित स्तर पर सौंपा जाएगा।

‘जरूरत पड़ी तो सरकार को भी आइना दिखाएंगे’

बंधु तिर्की ने कहा कि आदिवासी समाज के अधिकारों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर जरूरत पड़ी तो सरकार को भी उसकी जिम्मेदारियों का एहसास कराया जाएगा।

उन्होंने दावा किया कि राज्य में ऐसे कई जनप्रतिनिधि हैं जिनकी राजनीतिक जड़ें झारखंड से बाहर के राज्यों से जुड़ी रही हैं। उन्होंने निशिकांत दुबे और संजय सेठ का उदाहरण देते हुए राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठाए।

‘आदिवासी नेता नहीं चेते तो दूरगामी परिणाम होंगे’

पूर्व मंत्री ने कहा कि आदिवासी एकता महाजुटान किसी एक राजनीतिक दल का कार्यक्रम नहीं था। उनके अनुसार, इसमें सभी राजनीतिक दलों को आमंत्रित किया गया था और इसका उद्देश्य आदिवासी समाज के व्यापक मुद्दों को सामने रखना था।

उन्होंने कहा कि झारखंड गठन के करीब 26 वर्षों के दौरान आदिवासी समाज से जुड़े कई गंभीर प्रश्न अब भी बने हुए हैं। इनमें CNT एक्ट, स्थानीय नीति और विस्थापन जैसे मुद्दे प्रमुख हैं।

बंधु तिर्की ने सवाल उठाया कि जब संसद और विधानसभा में आदिवासी समाज के हितों की मजबूती से पैरवी की जरूरत होगी, तब पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं होने की स्थिति में समाज अपनी आवाज कहां और किसके माध्यम से उठाएगा।

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि आदिवासी नेता समय रहते इन मुद्दों को लेकर गंभीर नहीं हुए तो भविष्य में इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।

पांचवीं अनुसूची और विस्थापन का मुद्दा उठाया

बंधु तिर्की ने पांचवीं अनुसूची का जिक्र करते हुए कहा कि अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी हितों की रक्षा के लिए संवैधानिक प्रावधान किए गए हैं। इसके बावजूद बांध, उद्योग और अन्य विकास परियोजनाओं के नाम पर आदिवासी समुदायों के विस्थापन का मुद्दा लगातार सामने आता रहा है।

उन्होंने कहा कि विकास के साथ-साथ आदिवासी अधिकार, जमीन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की सुरक्षा भी सुनिश्चित होनी चाहिए।

ईसाई-सर्ना विवाद को लेकर RSS पर आरोप

बंधु तिर्की ने आरोप लगाया कि आदिवासी समाज के भीतर ईसाई और सरना समुदायों के बीच मतभेद पैदा करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने इसे आरएसएस की रणनीति बताया।

हालांकि, यह आरोप बंधु तिर्की के राजनीतिक बयान का हिस्सा है। संबंधित संगठन या पक्ष की प्रतिक्रिया सामने आने पर उसे भी खबर में शामिल किया जा सकता है।

परिसीमन पर आगे आंदोलन जारी रखने का संकेत

बंधु तिर्की ने स्पष्ट किया कि परिसीमन और आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा आगे भी उठाया जाएगा। उन्होंने कहा कि इस विषय को किसी अन्य राजनीतिक मुद्दे के पीछे दबने नहीं दिया जाएगा।

उन्होंने कहा कि ज्ञापन के माध्यम से राष्ट्रपति, राजनीतिक दलों और केंद्र सरकार के समक्ष आदिवासी समाज की चिंताओं को रखा जाएगा और झारखंड में राजनीतिक प्रतिनिधित्व को मजबूत करने तथा आदिवासी अधिकारों की रक्षा की मांग जारी रहेगी।

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