रांची:  आदिवासी राजनीति और झारखंड के मौजूदा सियासी घटनाक्रम को लेकर आदिवासी नेत्री निशा भगत ने एक विशेष साक्षात्कार में कई मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने आदिवासी महाजुटान, चर्च की फंडिंग, कांग्रेस, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, जयराम महतो और ज्योत्सना केरकेट्टा को लेकर तीखे सवाल उठाए।

निशा भगत ने दावा किया कि जिस कार्यक्रम को आदिवासियों का बड़ा जुटान बताया जा रहा है, वह वास्तव में कांग्रेस की राजनीतिक रैली थी। उन्होंने चर्च की फंडिंग और आदिवासी मुद्दों के नाम पर राजनीति किए जाने पर भी सवाल खड़े किए।

‘ये आदिवासियों का महाजुटान नहीं, कांग्रेस की रैली थी’

निशा भगत ने कहा कि आदिवासी समाज के नाम पर आयोजित कार्यक्रम को ‘महाजुटान’ बताना सही नहीं है। उनके मुताबिक, इस आयोजन में आदिवासी मुद्दों से ज्यादा राजनीतिक गतिविधियां दिखाई दीं।

उन्होंने आरोप लगाया कि आदिवासी समाज के नाम पर कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर आयोजन वास्तव में आदिवासियों की आवाज को बुलंद करने के लिए था, तो इसके पीछे राजनीतिक दल की भूमिका इतनी प्रमुख क्यों रही?

‘चर्च की फंडिंग पर रैली का दिखावा’

निशा भगत ने चर्च की फंडिंग को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि इस मुद्दे पर आदिवासी समाज के नाम पर रैली और प्रदर्शन का दिखावा किया जा रहा है।

हालांकि, उनके इन आरोपों के समर्थन में किसी विशिष्ट दस्तावेज या वित्तीय रिकॉर्ड का विवरण इस बातचीत में सामने नहीं आया। संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया आने पर उसे भी खबर में शामिल किया जा सकता है।

हेमंत सोरेन को सलाह- ‘ईसा-मूसा से बाहर निकलें’

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर निशाना साधते हुए निशा भगत ने उन्हें ‘ईसा-मूसा’ के राजनीतिक संदर्भ से बाहर निकलकर आदिवासी समाज के मूल मुद्दों पर ध्यान देने की सलाह दी।

उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान और उसके अधिकारों से जुड़े सवालों पर राजनीति करने के बजाय सरकार को जमीन पर काम करना चाहिए।

‘सरना और सनातन एक नहीं तो सरना-ईसाई एक कैसे?’

निशा भगत ने सरना धर्म और ईसाई धर्म के बीच राजनीतिक बहस पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि अगर सरना और सनातन को एक नहीं माना जाता, तो फिर सरना और ईसाई पहचान को एक मानने का आधार क्या है?

उनका कहना था कि आदिवासी समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को लेकर स्पष्ट बहस होनी चाहिए और राजनीतिक सुविधा के हिसाब से इसकी व्याख्या नहीं की जानी चाहिए।

‘आदिवासियों की बात करने वालों ने ही समाज को ठगा’

निशा भगत ने आदिवासी हितों की राजनीति करने वाले नेताओं पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि आदिवासियों के अधिकारों और विकास की बात करने वाले कई नेताओं ने सत्ता और राजनीति में आने के बाद समाज को अपेक्षित लाभ नहीं दिया।

उन्होंने सवाल उठाया कि वर्षों से आदिवासी मुद्दों पर राजनीति होने के बावजूद समाज के बड़े हिस्से को आज भी शिक्षा, रोजगार, जमीन और मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है।

जयराम महतो पर भी बरसीं निशा भगत

निशा भगत ने जयराम महतो को लेकर भी तीखी टिप्पणी की। उन्होंने महतो की राजनीति और उनके द्वारा उठाए जाने वाले मुद्दों पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि केवल भाषण और नारों से झारखंड के जटिल सवालों का समाधान नहीं किया जा सकता।

उन्होंने आरोप लगाया कि झारखंड की राजनीति में भावनात्मक मुद्दों को उछालने के बजाय नेताओं को रोजगार, शिक्षा, विस्थापन, स्थानीय अधिकार और विकास जैसे वास्तविक सवालों पर जवाब देना चाहिए।

ज्योत्सना केरकेट्टा पर भी तीखा हमला

निशा भगत ने ज्योत्सना केरकेट्टा को लेकर भी बेहद तीखी टिप्पणी की। उन्होंने उनके राजनीतिक रुख और बयानों की आलोचना करते हुए व्यक्तिगत स्तर पर भी कटाक्ष किया।

इसी क्रम में उन्होंने ज्योत्सना केरकेट्टा के लिए ‘मूर्खों की महारानी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। हालांकि, यह निशा भगत की व्यक्तिगत टिप्पणी है और संबंधित पक्ष का जवाब इस रिपोर्ट में उपलब्ध नहीं है।

आदिवासी राजनीति में बढ़ती बयानबाजी

निशा भगत के इस बयान के बाद झारखंड में आदिवासी राजनीति से जुड़े मुद्दों पर बहस और तेज होने की संभावना है। उनके निशाने पर एक साथ कांग्रेस, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, जयराम महतो और ज्योत्सना केरकेट्टा रहे।

अब देखना होगा कि निशा भगत के आरोपों और टिप्पणियों पर संबंधित राजनीतिक दलों और नेताओं की ओर से क्या प्रतिक्रिया सामने आती है। खासकर आदिवासी पहचान, सरना धर्म, चर्च की भूमिका और राजनीतिक लामबंदी जैसे मुद्दे आने वाले दिनों में झारखंड की राजनीति में बड़ा विवाद बन सकते हैं।