गिरिडीह के तिसरी जंगलों में बेशकीमती पत्थरों के कथित कारोबार का जाल? वन विभाग की निगरानी पर उठे सवाल
तिसरी गिरिडीह जिले के तिसरी प्रखंड के विभिन्न वन
क्षेत्रों में बेशकीमती पत्थरों के कथित संग्रहण, भंडारण और कारोबार को लेकर चर्चाएं तेज
हैं। असुरहड्डी, चरकी,
ढिबरी पहाड़ी, करमा पहाड़ी और मुखबली समेत कई इलाकों
में सफेद क्वार्ट्ज पत्थरों के संग्रहण की बात सामने आ रही है। वहीं, असुरहड्डी क्षेत्र से रात के अंधेरे में
कथित तौर पर बैरल पत्थर निकाले जाने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। इन चर्चाओं के
बीच वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, मामले से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र
पुष्टि नहीं हुई है। स्थानीय सूत्रों के
अनुसार, जंगलों से एकत्र किए
जाने वाले पत्थरों को मजदूरों से लगभग 50 रुपये प्रति किलो की दर से खरीदे जाने की बात कही जा रही है।
वहीं, स्थानीय बाजार में
इनकी कीमत करीब 70 रुपये
प्रति किलो तक होने का दावा किया जा रहा है। उच्च गुणवत्ता वाले क्वार्ट्ज पत्थरों
की कीमत इससे अधिक होने की भी चर्चा है। हालांकि, पत्थरों की वास्तविक गुणवत्ता, बाजार मूल्य और कारोबार के कुल दायरे की
स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। सूत्रों का दावा है
कि एकत्र किए गए पत्थरों को पिकअप वैन और अन्य वाहनों के माध्यम से अलग-अलग
स्थानों तक पहुंचाया जाता है। कथित तौर पर इस गतिविधि में संग्रहण से लेकर भंडारण
और परिवहन तक की व्यवस्था शामिल है। स्थानीय सूत्रों ने
आरोप लगाया है कि पत्थरों के संग्रहण के काम में महिलाओं और किशोरों को भी लगाया
जाता है। इनके जरिए जंगलों से पत्थर चुनवाए जाने की बात कही जा रही है। इसके अलावा,
कुछ आदिवासी परिवारों के घरों और
स्थानीय कारोबारियों के ठिकानों पर पत्थरों का भंडारण होने की चर्चा भी सामने आई
है। इन आरोपों की पुष्टि के लिए आधिकारिक जांच जरूरी है। स्थानीय सूत्रों ने
मुखबली, बड़की लदबेदवा,
चरकी, लपरियाटांड़ और डुब्बा समेत कुछ
क्षेत्रों में क्वार्ट्ज और अन्य पत्थरों के कथित कारोबार की जानकारी दी है। दावा
किया जा रहा है कि एकत्र किए गए पत्थरों की आपूर्ति तिसरी प्रखंड के एक कथित
बिचौलिए के माध्यम से होती है। इसके बाद पत्थरों को तिलैया, कोडरमा और गुजरात तक भेजे जाने की चर्चा
है। वहीं, असुरहड्डी क्षेत्र से कथित तौर पर
निकाले जाने वाले बैरल पत्थरों को कोडरमा के एक कारोबारी तक पहुंचाए जाने की बात
भी कही जा रही है। हालांकि, कारोबारियों
की भूमिका, पत्थरों की ढुलाई और
बताए गए बाजारों तक आपूर्ति के दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। स्थानीय लोगों के
अनुसार, भारतीय भूवैज्ञानिक
सर्वेक्षण (जीएसआई) की टीम की गतिविधियों के दौरान असुरहड्डी क्षेत्र में पत्थरों
से संबंधित कथित गतिविधियां कुछ समय के लिए प्रभावित हुई थीं। यह भी चर्चा है कि
सर्वेक्षण टीम के लौटने के बाद रात के समय ऐसी गतिविधियां फिर शुरू हो गईं।
हालांकि, इस दावे पर संबंधित
विभाग की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। यदि वन क्षेत्रों में
बड़े पैमाने पर पत्थरों का संग्रहण, भंडारण और परिवहन हो रहा है, तो इसकी निगरानी और रोकथाम के लिए
संबंधित विभाग क्या कदम उठा रहे हैं? स्थानीय स्तर पर उठ रहे इन सवालों के बीच वन विभाग की
कार्यप्रणाली पर चर्चा हो रही है। वन संपदा और खनिज
संसाधनों की सुरक्षा के लिहाज से यह मामला महत्वपूर्ण है। यदि आरोप जांच में सही
पाए जाते हैं, तो
यह वन क्षेत्रों की निगरानी, पर्यावरण
संरक्षण और खनिज संसाधनों के संभावित अवैध दोहन से जुड़ा विषय बन सकता है। इस संबंध में तिसरी
के रेंजर अनिल कुमार ने कहा कि पत्थर माफिया के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जा रही
है। उन्होंने बताया कि इस मामले में सूचना मिली है और जल्द ही पत्थर कारोबारियों
को चिह्नित कर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल, पूरे मामले में संबंधित विभागों की जांच
अहम है। जांच से ही स्पष्ट हो सकेगा कि वन क्षेत्रों में पत्थरों के कथित संग्रहण,
भंडारण और परिवहन को लेकर लगाए जा रहे
आरोपों में कितनी सच्चाई है। साथ ही, जांच के निष्कर्षों से वन विभाग की निगरानी व्यवस्था और कथित
कारोबार से जुड़े सवालों पर भी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।50 रुपये प्रति किलो में खरीदारी, अधिक कीमत पर
बिक्री की चर्चा
महिलाओं
और किशोरों से पत्थर चुनवाने का आरोप
स्थानीय
कारोबारियों से बाहरी बाजारों तक आपूर्ति का दावा
जीएसआई
के सर्वेक्षण के बाद दोबारा गतिविधियां शुरू होने की चर्चा
वन
विभाग की निगरानी पर सवाल
रेंजर
अनिल कुमार ने कार्रवाई की बात कही
जांच
के बाद स्पष्ट होगी वास्तविक स्थिति














